✍️ दिलीप कुमार उदय – ब्लॉग 36
दिनांक: 28 जनवरी 2026
UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026
कानून क्या कहता है, और सोशल मीडिया क्या समझ रहा है
पिछले कुछ समय से उच्च शिक्षा से जुड़े एक विषय पर लगातार चर्चाएँ सामने आ रही हैं।
UGC द्वारा अधिसूचित Equity Regulations को लेकर कहीं इन्हें “नया कानून” बताया जा रहा है,
तो कहीं यह धारणा बनाई जा रही है कि ये नियम किसी एक वर्ग को निशाना बनाते हैं
या इनका दुरुपयोग बड़े पैमाने पर हो सकता है।
लेकिन किसी भी कानूनी प्रावधान को समझने का सही तरीका
सोशल मीडिया की बहस नहीं, बल्कि उसका मूल पाठ, उसकी भाषा
और उसकी प्रक्रिया होती है।
इसी दृष्टि से यह लेख यह समझने का प्रयास करता है कि
UGC के ये Regulations वास्तव में क्या कहते हैं
और उनके बारे में बनाई जा रही धारणाएँ कितनी ठोस हैं।
यह Act नहीं है, Regulation है — यह फर्क समझना ज़रूरी है
सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि
UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026
कोई संसद में पारित नया कानून (Act) नहीं हैं।
ये नियम University Grants Commission (UGC) द्वारा
UGC Act, 1956 के अंतर्गत प्रदत्त वैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए बनाए गए हैं।
कानूनी दृष्टि से इन्हें Subordinate / Delegated Legislation कहा जाता है।
हालाँकि ये संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम नहीं हैं,
लेकिन भारत सरकार के राजपत्र (Gazette of India) में
13 जनवरी 2026 को अधिसूचित होने के बाद
ये सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों पर बाध्यकारी हो जाते हैं।
यहीं से पहला भ्रम जन्म लेता है—
Regulation को Act मान लेना।
इन Regulations की मूल भावना
इन Regulations की मूल सोच यह है कि
उच्च शिक्षण संस्थान केवल डिग्री बाँटने की जगह न होकर
समान अवसर और गरिमा के केंद्र हों।
इसीलिए यह स्पष्ट किया गया है कि
विश्वविद्यालयों में किसी भी छात्र, शोधार्थी या कर्मचारी के साथ
जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, सामाजिक पृष्ठभूमि या दिव्यांगता
के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
यह सोच नई नहीं है।
यह सीधे-सीधे भारतीय संविधान के
अनुच्छेद 14, 15 और 21
— समानता, भेदभाव से संरक्षण और गरिमा के साथ जीवन —
से प्रेरित है।
“जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, सामाजिक पृष्ठभूमि या दिव्यांगता” का वास्तविक अर्थ
(SC/ST/OBC बनाम GEN की धारणा पर स्पष्टता)
जब इन Regulations में भेदभाव के आधार के रूप में
जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, सामाजिक पृष्ठभूमि या दिव्यांगता का उल्लेख किया गया है,
तो इसका आशय केवल एक सीमित सामाजिक बहस से नहीं है।
फिर भी व्यवहार में अक्सर इसे
SC/ST या OBC बनाम General (GEN)
के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है,
जो Regulations की मूल भावना को अधूरा बना देता है।
जाति (Caste) के संदर्भ में यह समझना ज़रूरी है कि
इन Regulations में SC, ST और OBC —
तीनों को एक व्यापक जाति-आधारित समावेशन ढांचे के अंतर्गत देखा गया है।
इसका उद्देश्य किसी वर्ग को विशेषाधिकार देना नहीं,
बल्कि यह स्वीकार करना है कि
उच्च शिक्षा में असमानताएँ
केवल दो श्रेणियों तक सीमित नहीं रहतीं,
और OBC पृष्ठभूमि से आने वाले अनेक विद्यार्थी व कर्मचारी भी
संरचनात्मक कठिनाइयों का सामना करते रहे हैं।
धर्म (Religion) के आधार पर भेदभाव का आशय
किसी धर्म को बढ़ावा देना या किसी को हाशिये पर रखना नहीं है।
यह केवल यह सुनिश्चित करता है कि
किसी भी व्यक्ति के साथ
उसकी आस्था या विश्वास के कारण
अलग या पक्षपातपूर्ण व्यवहार न हो।
लिंग (Gender) की अवधारणा
केवल पुरुष और महिला तक सीमित नहीं है।
इसमें महिलाओं के साथ होने वाला संस्थागत पक्षपात,
तृतीय लिंग व्यक्तियों की उपेक्षा
और लैंगिक पहचान के आधार पर
अवसरों से वंचित किया जाना भी शामिल है।
इस दृष्टि से ये Regulations
सभी श्रेणियों की महिलाओं को
समान रूप से संरक्षण प्रदान करते हैं।
क्षेत्र (Region / Place of Origin) का अर्थ है कि
किसी छात्र या कर्मचारी के साथ
उसके गाँव, कस्बे, राज्य, भाषा
या “स्थानीय–बाहरी” पहचान के कारण
भेदभाव न किया जाए।
सामाजिक पृष्ठभूमि (Social Background)
एक व्यापक अवधारणा है।
इसमें आर्थिक स्थिति, पारिवारिक परिवेश,
पहली पीढ़ी का शिक्षार्थी होना
या संसाधनों और मार्गदर्शन की कमी
जैसी परिस्थितियाँ शामिल होती हैं,
जिनके आधार पर किसी व्यक्ति को
कम सक्षम मान लिया जाता है।
दिव्यांगता (Disability / Divyangta)
केवल शारीरिक अक्षमता तक सीमित नहीं है।
इसमें दृष्टि, श्रवण, बौद्धिक
और अन्य प्रकार की अक्षमताएँ भी आती हैं,
जहाँ व्यक्ति को
अपनी क्षमता के बावजूद
केवल दिव्यांगता के कारण
अलग या कमतर व्यवहार का सामना करना पड़ता है।
General (GEN) श्रेणी: इस समावेशी ढांचे का ही हिस्सा
इन Regulations में General (GEN) श्रेणी को
न तो बाहर रखा गया है
और न ही उन्हें स्वतः किसी प्रकार से
“आरोपी” या “दोषी” मान लिया गया है।
भेदभाव-निरोध का यह सिद्धांत
सभी पर समान रूप से लागू होता है —
चाहे व्यक्ति SC, ST, OBC से आता हो या GEN से।
यदि किसी परिस्थिति में
General श्रेणी से आने वाले किसी छात्र या कर्मचारी के साथ भी
अनुचित, पक्षपातपूर्ण या अपमानजनक व्यवहार होता है,
तो वह भी इसी समावेशी व्यवस्था के अंतर्गत
अपनी बात रखने का अधिकार रखता है।
इन Regulations का उद्देश्य
किसी एक वर्ग को “victim”
और किसी दूसरे वर्ग को “आरोपी” के रूप में स्थापित करना नहीं है,
बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि
उच्च शिक्षा संस्थानों में
हर व्यक्ति — किसी भी श्रेणी से हो —
सम्मान, समान अवसर और गरिमा के साथ व्यवहार पाए।
Equal Opportunity Centre और Equity Committee की भूमिका
इन Regulations का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि
हर उच्च शिक्षण संस्थान में
Equal Opportunity Centre (EOC) की स्थापना अनिवार्य की गई है।
EOC के अंतर्गत गठित Equity Committee में
SC, ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य रखा गया है,
ताकि निर्णय-प्रक्रिया
एकतरफ़ा नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व-आधारित और संतुलित बनी रहे।
शिकायत की प्रक्रिया, दुरुपयोग की आशंका और safeguards
यह आशंका व्यक्त की जाती है कि
ऐसी व्यवस्थाओं का दुरुपयोग हो सकता है।
लेकिन कानून और नियम
आशंकाओं पर नहीं, बल्कि तथ्यों और प्रक्रिया पर कार्य करते हैं।
शिकायत दर्ज होने के बाद
जांच, सुनवाई और आवश्यक कार्रवाई की
एक संरचित प्रक्रिया अपनाई जाती है।
यदि किसी मामले में यह पाया जाता है कि
शिकायत दुर्भावनापूर्ण या झूठी है,
तो उसके समाधान और दंड के लिए
अनुशासनात्मक नियम, दंडात्मक कानून
और न्यायिक उपाय पहले से मौजूद हैं।
कानून का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं,
बल्कि संतुलन बनाए रखना है।
Appeal और Safeguards
इन Regulations में यह भी स्पष्ट किया गया है कि
यदि कोई पक्ष समिति के निष्कर्ष से असहमत हो,
तो उसके पास अपील का अधिकार उपलब्ध है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि
निर्णय अंतिम और एकतरफ़ा न होकर
जांच-योग्य और समीक्षा-योग्य बने रहें।
सोशल मीडिया के दावे और वास्तविक पाठ
समस्या तब पैदा होती है जब
Regulations को पूरा पढ़े बिना
उन पर आधारित निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं।
Regulation को Act बता देना,
प्रक्रिया को भय के रूप में प्रस्तुत करना
या समता की अवधारणा को
किसी एक वर्ग के खिलाफ खड़ा कर देना —
ये सभी बातें
मूल Gazette पाठ से मेल नहीं खातीं।
निष्कर्ष: डर नहीं, समझ की ज़रूरत
किसी भी कानून या Regulation का मूल्यांकन
उसकी मंशा, भाषा और प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए,
न कि अधूरी जानकारी और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के आधार पर।
UGC के Equity Regulations, 2026
यह याद दिलाते हैं कि
उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं,
बल्कि समानता और सम्मान का वातावरण बनाना भी है।
कानून यहाँ डर पैदा करने के लिए नहीं,
बल्कि जिम्मेदारी और संतुलन तय करने के लिए है।
✍️ दिलीप कुमार उदय – ब्लॉग 36
लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।
यह लेख सामान्य जन-जागरूकता एवं कानूनी साक्षरता हेतु है,
न कि किसी विशिष्ट मामले में कानूनी सलाह।
— Adv. Dilip Kumar Udai
(Bachelor of Journalism & LL.B.)
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